मजदूरो को भेड़ बकरियों की तरह ट्रक या अन्य वाहनो में ढोया जा रहा है।

मजदूरो को भेड़ बकरियों की तरह ट्रक या अन्य वाहनो में  ढोया जा रहा है।

t4unews:जबलपुर हाइ वे , मजदूरो को भेड़ बकरियों की तरह ट्रक या अन्य वाहनो में उनकी अपनी इच्छा से  डबल डेकर  बस की तरह फर्श पर बैठा के ढोया जा रहा है। मजबूरी और जल्दी जो ना कराएँ कम है । अभी तो जुनून है   मजदूर भाईयो में  किसी तरह मंजिल अपने  घर गांव तक पहुँच जाने की है । पर गांव पहुँच के आखिर करेंगे क्या ?

भेड़ बकरियों जैसे लाखों मानवों के साथ सलूक

मजदूरों का इतनी बड़ी संख्या में पलायन होना  प्रशासन के लिए बहुत विकराल समस्या का रूप धारण करेंगी । यदि घर में ही रोजी-रोटी और तमाम प्रकार की सुविधाएं होती तो लोग बाहर क्यों जाते हैं ?  अब जब  दूसरे राज्य घर से बाहर जाकर  यदि रोजगार को अर्जित करने का तरीका लोगों ने खोज लिया था और उसके पीछे भी एक अच्छा सार्थक रोजगार परक  पहल लोगों को मिल गया था तो ऐसे समय कोरोना  महामारी की मार से  तो लोगों को जीना मुहाल हो गया और दिमाग में एक सनक  आ गई कि अब हमें केवल घर जाना है।   लेकिन यह बात काबिले गौर है कि घर जाकर की भी लोग क्या करेंगे  एक संयुक्त परिवार में वैसे भी चंद कमरे होते हैं और इन्हीं सब समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए और घर की आपस की झगड़ों से निपटने के लिए महिलाओं की अपनी समस्या एवं पुरुषों की आपस की अपने विस्तार वादी नीति को देखते करते हुए लोग अपने पैतृक घर गांव को छोड़कर बड़े-बड़े महानगरों की ओर चले गए थे ।   महानगरों में भी औद्योगीकरण यह विभिन्न प्रकार के कई कामों में स्वयं को व्यवस्थापित करते  करते  जब  अपनी रोजी रोटी बनाने लगे और साल दर साल बिताते  किसी भी बड़े महानगर में रहने लगे तो वहां की  स्थानीय लोगों को इनके जमे हुए कारोबार और जमी हुई रोजगारी को देखते हुए जलन सी महसूस होने लगी थी । कई राजनेतिक पार्टियां के  लोग लग गए कि बिहार और यूपी के लोंगो को  वहां से हटाया जाए जाए  । जिससे की स्थानीय लोगों को अच्छी नौकरी मिल सके । जिसमें दूसरे प्रांत से आए लोगों को वहां की अच्छी नौकरी का मौका ना मिल पाए । जब कोरोना  का आक्रमण हुआ जब  अब दूसरे प्रांत से आए खासकर गरीब प्रांत बिहार , बंगाल,  मध्य प्रदेश ,  ओडिशा और भी कई प्रकार की गरीब प्रांत  जहां जुझारू और कर्मठ लोगों का एक अच्छा जमघट होता है उनकी द्वारा  औद्योगिक क्रांति जैसी जगहों से पलायन होने के बाद देश में बंद  उद्योग की  दुर्गति चरम सीमा पर पहुंचने  लगी है ।
लेकिन कोरोना  के कारण लोगों का वापस अपने अपने गांव वापस  जाने का क्रम आरंभ हुआ तब  यह बात समझ से परे है कि पहले  बेरोजगारी और विभिन्न प्रकार की समस्याओं को झेलते हुए इन बीमारू प्रदेशों में किस तरीके से इन मजदूरों में रोजगार का  समायोजन कैसे  होगा?  क्या रोजगार मिलेगा?  क्या काम मिलेगा ? यह एक प्रश्न  अभी विचारणीय  है । यह बात तो तय है कि  1 सप्ताह से एक पखवाड़े के अंदर ही इस प्रकार पलायन का भूत उतरते ही लोग पुनः  अपने उसी संस्थान को ज्वाइन करना चाहेंगे जहां पहले उन्हे रोजी,  रोटी और छांव मिली थी।  जहां उनके बच्चे पढ़ लिख रहे थे या जहां उन्हें जिंदगी कुछ सुलभ लग रही थी । अच्छा तो होता है  काम देने वाले या  मिल मालिकों या प्रशासन द्वारा इन मजदूरों को जहां से मजदूर  पलायन कर रहे हैं वहीं कहीं रोकने या बसाने की तरकीब होती तो इस व्यर्थ का भ्रमण खर्च और परेशानी से बचत दोनों पक्षों  की हो सकती थी ।



Download smart Think4unity app