काले और कुरूप लोगों का क्या होगा?

काले और कुरूप लोगों का क्या होगा?
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t4unews:जीवन में ख़ूबसूरती और सुंदरता ,सत्यम शिवम सुंदरम की तरह है। सभी जगह यदि आप का स्वरूप सुंदर है और ऊपर से शरीर मांसल है तथा गौर वर्ण है  तो आपकी पचासी 85% बाधाएं दूर हो जाती हैं। शादी विवाह जैसी मांगलिक कार्यों से संबंधित कामों में बची 15% आपकी योग्यता और एबिलिटी पर देखा जाता है ।यदि आपका शेष 10 से 15 परसेंट कुरूपता या काले वर्ण सांवले वर्ण के हो तो आपकी जीवन में केवल निराशा और अंधकार के सिवा कुछ नहीं बचता है।
यह बात तो सभी जानते हैं परंतु यहां अब लोग सांवले वर्ण के वर्ग के लिए गोरी चमड़ी के या गोरे रंग के वधू खोजने का प्रयास जी तोड़ करते हैं और इसके लिए वह गली-गली, जंगल- जंगल ,देश-प्रदेश भटकते हैं ।शायद इसीलिए बालिकाओं को गोरा बनाए रखने के लिए वह सभी जतन किए जाते हैं ।अगर घर में कन्या हो गई तो उसकी क्वालिटी और उसकी खूबसूरती बनी रहे इसके लिए उसे श्रम साधक कार्य या एथलीट जैसे मेहनत करने वाले कोई भी कार्य  हो अथवा धूप से बचने की सलाह देते हैं या घर में ही रहने की सलाह दी जाती है।
इससे लोगों का मंतव्य साफ हो जाता है कि जब तक संबंध ब्याह शादी के निश्चित ना हो जाए तब तक हम अपने घर की संपत्ति यानी कि अपने धन को जो किसी दूसरे को सौंपना है उसे सुरक्षित चमकते हुए रखें ।और देखें वर पक्ष भी यही उम्मीद वधू पक्ष से रखता है। इसलिए वह पहले कमाऊं घोड़े के रूप में खुद को स्थापित करने के लिए यथासंभव अध्ययन या अपने व्यापार या अपनी संपत्ति को बढ़ाने मे लिए लग जाता है या उसे पुरखों  के संपत्तिसे मिली संपत्ति पर अधिकार मिलने के बाद खोज शुरू होती है सुयोग्य गौर वर्ण की सुशिक्षित कन्या की रिश्ते मिले।
प्रश्न यह उठता है कि इस प्रकार की रिश्ते या इच्छा सभी लोग रखते हैं तो को  सांवले रंग के या काले रंग के अन्य वर ,वधु या प्राणियों का क्या होगा?
 क्या उन्हें अपने ब्याह काम के लिए दूसरे देश जाना होगा या काले को काला ही मिलेगा। अगर वह अच्छा हुआ तो यदि उसकी अच्छी खासी आमदनी या जॉब लग गई तब तो फिर इस विषय में चर्चा करना ही बेकार है क्योंकि फिर तो " एक अनार सौ बीमार "की कहावत में फिट बैठगी। पर ऐसे भी कई लोग हैं 99% जिन्हें जीवन में वह सब नहीं मिल पाता जिन रिश्तो की वह कल्पना करते हैं। इन हालातों में गौर वर्ण की सुंदर वर वधु की की तलाश में लोग अपनी यात्रा कहां तक रखें?
कहा जाता है कि काली चाय में दूध मिलाकर चाय को काली से गोरी तक बनाया जा सकता है ।इसी प्रकार नस्ल सुधार हेतु यदि लोग अपने जीवन में काले और गोरे  का सम्मिश्रण करते हुए समझौता करें तो वह भी संभव नहीं है क्योंकि हर जगह संपन्नता ,असमर्थता आड़े आती है। जीवन में इस प्रकार की उपलब्धि सबको तो नहीं मिलती "समरथ को नहिं दोष गुसाईं ।"तो क्या किया जाए ऐसे समय समाज का यह विचारणीय मुद्दा कहीं जाकर अंत होता ही नहीं दिखता ।अंततः यही कहना पड़ता है कि किस कार्य में सफलता का पैमाना क्या है ?अर्थात यदि आप आर्थिक रूप से संपन्न है तो उसकी भरपाई या आर्थिक क्षति पूर्ति करते हुए सामने के संबंध को आप इतना कंपनसेट करें, इतना क्षतिपूर्ति प्रदान करें जिसे या तो दहेज का नाम दे दिया जाता है या सामने वाले को मुंह बंद रखने की कीमत। हमारी यही महत्वाकांक्षा हमें कहां से कहां ले जा रही है और इस समाज में कंपटीशन ,प्रतिस्पर्धा का भंडार खड़ा होता जा रहा है। जीवन के 50 वे वर्ष में इसका अर्थ समझते समझते देर हो जाती है ।सबको यही बात उचित लगती है कि जो वह कर रहे हैं या जो वह समझ रहे हैं वर्तमान में वही सत्य हैं।



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