उधर मत देखना..... आखिर मना करने के बाद देख लिया ना तुमने

 सभी जानते हैं की लोभ, मोह, काम, क्रोध, मद-मत्सर यह चोर बहुत भारी होते हैं हमारे जीवन में ।हम इस प्रकार के विकारों से जब तक मानव हैं तब तक कभी भी बच नहीं सकते। बड़े-बड़े साधु सन्यासी ऋषि मुनि भी इस विकार के चक्कर में आकर पतित हो चुके हैं। ऐसा हमारा पुराण इतिहास और सभ्यता के वह सभी गवाह हमें दर्शाते हैं । 

उधर मत देखना..... आखिर मना करने के बाद देख लिया ना तुमने
Ripped jeans comments

t4unews:- किसी जगह दीवाल में लिखा था पीछे मुड़कर मत देखना। यह एक ऐसी जगह लिखा था जो प्रसाधन का कमरा था ।हम टेंशन फ्री होने के बाद दिमाग पर जोर डालने लगे ऐसा क्या चीज है जो उसने लिखा है कि" पीछे मुड़कर मत देखना"। मन कौतूहल वश माना नहीं  क्योंकि मानव मन है कपि की तरह चंचल होता है। इसलिए सब से नजरे चुरा कर एक बार  झटके से मुड़ कर देख ही लिया और फिर मन खिन्न हो गया ।क्योंकि पीछे बहुत ही भद्दी मां की गाली लिखी थी ।इसलिए शायद सामने उसने सावधान कर दिया था। यही हाल इस दृष्टांत की तरह हमारे जीवन में होता है। सभी जानते हैं की लोभ, मोह, काम, क्रोध, मद-मत्सर यह चोर बहुत भारी होते हैं हमारे जीवन में ।हम इस प्रकार के विकारों से जब तक मानव हैं तब तक कभी भी बच नहीं सकते। बड़े-बड़े साधु सन्यासी ऋषि मुनि भी इस विकार के चक्कर में आकर पतित हो चुके हैं। ऐसा हमारा पुराण इतिहास और सभ्यता के वह सभी गवाह हमें दर्शाते हैं । इस जीवन में जिसने इन प्रकार के काम ,क्रोध ,लोभ ,मोह, मद-मत्सर पर विजय पा लिया वह मानव से देव बन जाता है । समाज में लोगों का इस प्रकार के विकारों से मुक्त होकर रहने के लिए ही जीवन में कुछ मर्यादा में बनाई गई है। कुछ सामाजिक बंधन बनाए गए हैं। कुछ परिधि बनाई गई है कि हर व्यक्ति अपनी अपनी आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अपने प्लॉट में रहकर ही अपना निर्माण करें। दूसरे की प्लॉट यानी भूमि पर अतिक्रमण नहीं करें  यही मर्यादा शब्द समाज की परिकल्पना भी है। हम अपने इन सभी प्रकार के विकारों को दूर करने के लिए शादी-ब्याह, बाल-बच्चे और अपने घर ,जमीन-जायदाद के निर्माण में लगकर पुन: शून्य में मिल जाते हैं।


आजकल के परिधान और वेब सीरीज ,टीवी सीरियल तथा फिल्मों में और आजकल सोशल मीडिया में जिस प्रकार वर्जित एडल्ट कंटेंट को धड़ल्ले से दिखाया जा रहा है, यह निश्चित ही हमारी सामाजिक परंपरा और मानवता के प्रति अपराध है ,क्योंकि अगर इसी प्रकार जंगलराज को स्थापित करना है तो फिर कानून व्यवस्था या सामाजिक व्यवस्था बनाने की आवश्यकता क्या है? इस प्रकार की मूल्यों को स्थापित करने की आवश्यकता क्या है?
मधुमक्खी भी शहद का निर्माण करती है तो वह एक निर्धारित सुरक्षित और अपने नियंत्रण के क्षेत्र मैं निर्माण करती है।जो सब को अच्छा लगता है ।जो ऊपर दुरुह और कठिन जगह पर लटका होता है। जहां हर किसी आम व्यक्ति की पहुंच नहीं होती। वह अपने शहद का प्रदर्शन भी करती होती है ।कल्पना करें कि यदि यही शहद आपके घर के दरवाजे पर या आपके हाथ के पहुंच जैसी किसी भी ऐसी जगह पर  अगर लगाया या बनता हो तो आप उसे छीनने झपटने की कोशिश तो करेंगे ही। अब इसमें यदि आप घायल भी हो तो कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि आप इतना रिस्क उठाने की क्षमता तो रखेंगे ही क्योंकि सवाल शहद को पाने से है।यही क्रम आजकल की नारियां कर रही हैं और इस समाज में समानता का अधिकार का दुरुपयोग कर रही हैं ।जिस प्रकार बैटरी के दो ध्रुव आपस में मिला कर रखे नहीं जा सकते एक से धनात्मक किरणें निकलती हैं तो दूसरे से ऋणात्मक ।अगर दोनों का मिलन होता है तो स्पार्किंग होने लगती है ।ऊर्जा का क्षरण होने लगता है ।भीषण अग्निकांड हो सकता है ।यदि किसी सुरक्षित परिपथ के द्वारा उसे सृजनात्मक कार्यों में लेते हुए उपयोग किया जाता है तो यही ऊर्जा  लाभकारी हो जाती है। यहां अगर हम नारी शक्ति को धनात्मक माने यह ऋणात्मक माने  तो वह पुरुष शक्ति की दूसरी बिंदु से इस प्रकार का सम्मेलन या मिलन करने हेतु कुत्सित प्रयास न  करें । कोई घटना होती हो तो उसके लिए दोष और उसकी नजरें ,नियत और विचारधारा को नहीं दें ।यह बात तर्कसंगत नहीं लगती कि हम अपने भोजन ,मिठाई या किसी अच्छी चीज को ढककर  स्वंय नहीं रखें और  उसमें बैक्टीरिया, मक्खी, मच्छर इत्यादि तो आकर बैठें और हम उस जहर जैसे पदार्थ को खाकर बीमार पड़ जाए। फिर इसमें दोष किसका होगा आप विद्वान जन स्वयं ही बताएं हमें आपकी टिप्पणियों और जवाब का इंतजार रहेगा।


अमुक व्यंग चित्र में श्री उत्तम शिलेदार द्वारा बताई गई परिकल्पना इस बात को चरितार्थ करती है।



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