प्रजा की राजा और राजा के बाद प्रजा

सरकार को भी कि चाहिए कि वह मीडिया से इस बात का अपेक्षा रखें कि उनके द्वारा लिए जा रहे सभी निर्णयों की समीक्षा एक आलोचक के दृष्टिकोण से भी करें ।सदैव मीठी मीठी ठकुर सुहाती बातें सुनने और अपनी वाहवाही लूटने का प्रयास भी करना कम उम्र वाली राजनीति का द्योतक होता है।

प्रजा की राजा और राजा के बाद प्रजा
Raja aur praja

t4unews:- राजा का निर्माण प्रजा के चाहत और संरचना के बाद होता है। जिस प्रकार यह शतरंज के प्यादे एक संगठन में संगठित होकर के अपने राजा का क्राउन , मुकुट, ताज को निर्धारित करते हैं उसे सम्मानित और उसकी ओहदे को बढ़ाने का कार्य करते हैं  कि वह प्रजा के कल्याण और प्राप्त शक्तियों ,शस्तियों और करो से देश को संपन्नता की ओर ले जाए ।सुरक्षित ढंग से लोगों का विकास करें। प्रजातांत्रिक ढंग से सब के मूल्यों का आदर करें और जितने वादे जितने संकल्प जितने सुविचार जो देश और जनता के कल्याण हेतु लिए जाते हैं उसे पूरा करें। कभी-कभी ऐसा देखा जाता है कि जिसकी छायाछत्र से राजा सुशोभित होता है वही राजा बनने के बाद छत्रछाया का विपरीत एवं प्रतिकूल परिणाम देने लग जाता है ।कुछ चाटुकारों की नजरों में और राजा की आंखों पर पट्टी बंध जाती है जो उसे यह आभास कराती है कि वह जो कर रहा है वह अति उत्तम है और समय की मांग के अनुरूप है। वह उसे अलोकप्रिय भी बना सकती है। जिस प्रकार शल्यक्रिया में एक डॉक्टर को शल्य करने हेतु आवश्यक अस्त्र उपकरणों से उन अंगों को काटना पीटना पड़ता है जो अनिवार्य होते हैं । परंतु इसकी भी एक सिद्धांत है कि किस प्रकार से किस उपचार को कब और कैसे करना है ? प्रैक्टिकल और प्रयोग करने की यह प्रयोगशाला जनता को नहीं बनाना चाहिए ।

जिसे गिनीपिग,चूहों बंदरों की भांति हम प्रयोग करते रहें और इस बात को प्रमाणित करते रहे कि हममें जो निर्णय लेने की क्षमता है या हम जिस देश के हित के लिए कार्य कर रहे हैं उस पर कोई भी विपरीत वचन या निंदा ना करें ,अन्यथा वह हमारी कोप का भाजन हो सकता है ।यह तो एक स्वस्थ प्रजातंत्र व्यवस्था के अनुकूल नहीं है क्योंकि तानाशाही अथवा एक व्यक्ति द्वारा निर्णय लेकर बिना लोगों को सहमति में लिए बिना  कार्य करना की प्रथा या तो विकास की ओर ले जा सकती है या सर्वथा विनाश की ओर ।हमें लोकतांत्रिक मूल्यों का और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ जाने की  मिडिया ,समाचार और पत्रकारिता को भी सही मूल्यों पर रखना होगा क्योंकि अच्छी चीजों का आकलन तो पूरी दुनिया और प्रजा कर लेती है पर बुरी चीजें या गलत चीजों का आकलन करने का कार्य  निंदक का होता है। जो हमें मीडिया या जनसंपर्क को सबक देना चाहिए और उनसे आग्रह करना चाहिए। सरकार को भी कि चाहिए कि वह मीडिया से इस बात का अपेक्षा रखें कि उनके द्वारा लिए जा रहे सभी निर्णयों की समीक्षा एक आलोचक के दृष्टिकोण से भी करें ।सदैव मीठी मीठी ठकुर सुहाती बातें सुनने और अपनी वाहवाही लूटने का प्रयास भी करना कम उम्र वाली राजनीति का द्योतक होता है।



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