#पलायन

#पलायन
पलायन

भाग रहा है वह

लंबे कदमों से,
पीछे खचुरता जा रहा है,
उसके परिवार सा कुछ।
एक सुखी अधमरी बच्ची,
और मैली सी उसकी औरत
जिसकी गोद में आधे से कपड़ो में,
रोता चीखता एक बच्चा है।
नंगा लिखने का साहस नहीं होता,
समाज है, 
भय सा लगता है,
भूख से!


किन्तु आज तय किया है उसने,
अपने लंबे कदमों से चल कर,
आज वह हराएगा भूख को,
सुना है,
बट रहा है भोजन,
तय किया है उसने,
आज खायेगा भर पेट,
अफवाह!
न, यह नहीं हो सकता,
सब उस ओर ही जा रहे हैं,
देखो पूरब की ओर,
क्या?
वह पूरब नहीं अब?
सूर्य वहाँ से जा चुका है।
फिर अगले दिन ही आएगा वह।
वहाँ तो रात है अब
पेट को घुटनों से लगा कर सो जाओ,
मैंने महसूस किया है,
भूख को शांत होते ऐसे।
अरे! रोने दो उन्हें,
वे अपना तरीका स्वयं ढूंढ लेंगे।

साभार

कवियत्री डॉक्टर नेहल सा संप्रति भोपाल मैं भोपाल मेमोरियल (स्मारक) अस्पताल एवं अनुसंधान केंद्र में कार्यरत हैं उनकी लिखी हुई कविता से मिट्टी की सुगंध और उनका प्रकृति से प्रेम नजर आता है।



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