खरी अखरी......... बडगैया की कलम से

राजधर्म _जो कभी गुजरात का हुआ करता धा आज यू पी का नजर आता है_

भारत में प्रतिबिंबित तुर्की में बनी 9 एम एम गिरसान और 9 एम एम जिगना पिस्टल का इस्तेमाल किया है। कहा जाता है कि इन पिस्टलों का अधिकारिक तौर पर उपयोग मलेशियाई सेना, अजरबैजान सशस्त्र बल, फिलीपींस राष्ट्रीय पुलिस और यू एस कोस्टगार्ड करती है।

खरी अखरी......... बडगैया की कलम से

t4unews: एनकाउंटर को अंजाम देने के लिए

खरी - अखरी

राजधर्म _जो कभी गुजरात का हुआ करता धा आज यू पी का नजर आता है_

देशभर में पुलिस द्वारा किए जाने वाले एनकाउंटर के पीछे की कहानी पूरा देश जानता है। पुलिसिया एनकाउंटर को यदि अधिकारिक तौर पर पुलिसिया हत्या का नाम दिया जाय तो शायद अनुचित नहीं होगा। एक समय एनकाउंटर के लिए महाराष्ट्र की पुलिस के चर्चे अखबारों की सुर्खियां हुआ करते थे आज उत्तर प्रदेश की पुलिस द्वारा किए जा रहे एनकाउंटर अखबारों की हेडलाइंस हुआ करती हैं।

एनकाउंटर को अंजाम देने के लिए तो कभी - कभी अपराधियों को लेकर जाने वाली पुलिस बैन भीअचानक पलट जाती है या फिर कहें कि पलटा दी जाती है। हर एक एनकाउंटर के बाद पुलिस द्वारा एक ही तरह की  कहानी दुहराई जाती है कि अपराधी पुलिस कस्टर्ड से भाग रहा था। पुलिस पर फायरिंग कर रहा था।

ऐसी ही कहानी पुलिस द्वारा एक बार फिर उस एनकाउंटर के बाद दुहराई जब गैंगस्टर से नेता बने अतीक अहमद के लौंडे असद अहमद और उसके साथी गुलाम को झांसी से 30 किलोमीटर दूर बडागांव के पास मार डाला गया। पुलिस उवाच तकरीबन यही रहा कि जब असद और गुलाम को रोका गया तो असद ने ब्रिटिश बुलडॉग 455 बोर रिवाल्वर और गुलाम ने 7.63 बोर की बाॅल्टर पी 88 पिस्टल से पुलिस दल पर फायर किया गया और जबावी कार्रवाई में दोनों मारे गए।

उत्तर प्रदेश की पुलिस की मानवीयता और कर्तव्यनिष्ठा उस समय सामने आ गई जब पुलिस कर्मियों के दलीय संरक्षण में चिकित्सकीय परीक्षण के लिए ले जाते समय अतीक और अशरफ को तीन युवकों ने ताबड़तोड़ फायरिंग करते हुए मौत के घाट उतार दिया।

घटना के जो वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हूए हैं उनसे तो यही पता चलता है कि हत्या करने के बाद आरोपियों ने जय श्री राम का उद्घोष भी किया। मारे गए दोनों लोगों को बचाने के लिए पुलिस कर्मियों ने कुछ नहीं किया। घटनास्थल पर मीडिया, कैमरा आदि पहले से ही ठीक उसी प्रकार तैनात थे जैसे किसी फिल्म की शूटिंग के दौरान रहा करते हैं।

जिगाना पिस्टल की मैगजीन में 15 राउंड होते हैं।


तुर्की निर्मित जिगाना पिस्टल की कीमत पांच से सात लाख रुपए तक है। भारत ने इस आग्नेयास्त्र पर एकमुश्त प्रतिबंध लगा दिया है। इसे अवैध रूप से पाकिस्तान के रास्ते भारत में लाया जाता है। इस गन के मैगजीन में 15 राउंड होते हैं।
 

बताया जाता है कि पुलिस ने दावा किया है कि हत्या के आरोपी लवलेश तिवारी (22) बांदा, मोहित उर्फ सनी सिंह (23) हमीरपुर तथा अरुण मौर्या (18) कासगंज ने हत्या को अंजाम देने के लिए भारत में प्रतिबिंबित तुर्की में बनी 9 एम एम गिरसान और 9 एम एम जिगना पिस्टल का इस्तेमाल किया है। कहा जाता है कि इन पिस्टलों का अधिकारिक तौर पर उपयोग मलेशियाई सेना, अजरबैजान सशस्त्र बल, फिलीपींस राष्ट्रीय पुलिस और यू एस कोस्टगार्ड करती है।

तीनों आरोपियों का अलग - अलग जगह का होने के बाद एक साथ आना, देश में प्रतिबिंबित हथियारों से घटना को अंजाम देना, घटना को कवर करने के लिए मीडिया का पूरी तन्मयता के साथ उपस्थित रहना, पुलिस की अपर्याप्त सुरक्षा, मीडिया को अतीक आदि से बात करने की इजाजत देना आदि खुद ही कई सवालों को खड़ा करते हैं।

साथ ही सारी परिस्थितियां मह भी इंगित करती है कि इस संभावना से इंकार नहीं कर सकते कि कहीं न कहीं इस हत्याकांड को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिलाया गया है। जिसमें शासन और प्रशासन की मिलीभगत भी हो सकती है।

बहरहाल सरकार ने जांच के लिए तीन सदस्यीय न्यायिक आयोग गठित कर दिया है जो दो महीने में अपनी रिपोर्ट देने कहा गया है। सच उजागर होगा या सुपुर्द - खाक भविष्य ही बतायेगा

योगी आदित्य नाथ  (अजय सिंह विष्ट) की सरकार ने माफिया सरगना अतीक के कुनबे को तो मौत की नींद सुला दिया तो क्या यह मान लिया जाय कि उत्तर प्रदेश और उत्तर प्रदेश की राजनीति अपराध मुक्त हो गयी है।

जबकि कहा जाता है कि कुलदीप सिंह सेंगर (तकरीबन 28 मामले), बृजेश सिंह (तकरीबन106 मामले), धन्नजय (तकरीबन 46 मामले), राजाभैया (तकरीबन 31 मामले ), उदयभान सिंह (तकरीबन 83 मामले ), अशोक चंदेल (तकरीबन 37 मामले ), विनीत सिंह (तकरीबन 34 मामले ), बृजभूषण सिंह (तकरीबन 48 मामले ), चुलबुल सिंह (तकरीबन 53 मामले ), सोनू सिंह (तकरीबन 57 मामले ), अजय सिंह सिपाही (तकरीबन 81 मामले ), पिन्टू सिंह (तकरीबन 23 मामले ),  सनी सिंह (तकरीबन 48 मामले ), संग्राम सिंह (तकरीबन 58 मामले ), चुन्नू सिंह (तकरीबन 42 मामले ), बादशाह सिंह (तकरीबन 88 मामले ), अभय सिंह (तकरीबन 49 मामले ), मोनू सिंह (तकरीबन 48 मामले ) जैसे बाहुबलियों की लम्बी फेहरिस्त हैं जिनके खिलाफ हत्या, हत्या का प्रयास, फिरौती, अपहरण, दंगा, बलात्कार, देशद्रोह जैसे संगीन अपराध दर्ज हैं।

इतना ही नही कहा तो यह भी जाता है कि इन नामधारियों के लडके, भाई, बाप भी बडे अपराधी हैं। प्रदेशवासियों की आंखें यह देखने को तरस रही हैं कि उत्तर प्रदेश की एनकाउंटर स्पेशलिस्ट पुलिस इन नामचीन बाहुबलियों का एनकाउंटर कब करेगी!

फिलहाल तो देखने में यही आता है कि सरकार का मुखिया और उसके नुमाइंदे ऐसे अपराधियों पर कार्रवाई करना तो दूर वे मीडिया के सामने इनका नाम लेने की भी हिम्मत नहीं जुटा पाते है। वजह भी साफ - साफ दिखाई देती है ऐसे लोगों या तो सत्ताधारी पार्टी के विधायक और सांसद हैं या फिर सत्ता पार्टी से उनका जुडाव है ।

बडे बुजुर्ग कहते हैं कि अपराधी जाति और मजहब से परे होते हैं। मगर वर्तमान परिवेश में यह बात पूरी तरह बेमानी लगती है। कारण अभी तक तो यही सामने आ रहा है कि संगीनतम अपराधियों पर की जाने वाली कार्रवाई धर्म और जाति के आधार पर ही की जा रही है। अब तो अपराधियों की एक ही जाति और एक ही धर्म दिखाई देता है और वह है सत्ता पार्टी

 साभार अश्वनी बडगैया अधिवक्ता
_स्वतंत्र पत्रकार_



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