देश और घर चलाना इतना आसान नहीं है।

देखिए शंभू कुमार सिंह की राकेश टिकैत के साथ इंटरव्यू रिपोर्ट नेशनल न्यूज़ सोशल मीडिया में

t4unews:-शंभू कुमार सिंह ऑनलाइन सोशल मीडिया नेशनल दस्तक  न्यूज़ चैनल के द्वारा राकेश टिकैत के साथ दिए गए इंटरव्यू में सरगर्भित बातें जो पाई हैं और निश्चित ही सुनने समझने और विचारणीय योग्य है कि क्या वास्तव में देश संविधान के नीति निर्माता बौरा गए हैं या अपनी बहुमत होने का नाजायज फायदा उठा रहे हैं।राकेश टिकैत वास्तव  में बहुत ही परिपक्व और गंभीर नेता हैं जिन्होंने आज तक कभी भी कोई भड़काऊ चीजें या लांछन वाली चीजें,आरोप  सीधे-सीधे लोगों पर नहीं लगाए हैं परंतु अपने तंज के रूप में ऐसी बातें हंसते-हंसते कह दी है जो समझने वालों को समझ जाती है और जो ना समझ सके वह अनाड़ी होते हैं।

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उन्होंने सुप्रीम कोर्ट की सर्वदा सम्मान करने की बात कही है परंतु सुप्रीम कोर्ट की बातों को सीधे-सीधे मानने से नकार भी करते हैं ।ऐसा सम्मान और ऐसी श्रद्धा भी किस काम की जहां हम सीधे शब्दों में इस बात को नहीं कह सकते कि "तुम हमें पसंद हो पर हमें तुम्हारी आदत पसंद नहीं" वाली बात चरितार्थ होती है ।उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के दुश्मन उनकी स्वयं की पार्टी के लोगों को ही करार देते हुए आपस में एक द्वंद पैदा कर दिया है ।साथ ही साथ स्वयं को यानि भारतीय किसान यूनियन को किसी भी राजनीतिक पार्टी का मुरीद तो नहीं बताया है। पर इस बात से इनकार भी नहीं किया है कि जो किसान पार्टियों को सपोर्ट देगा वे उसके साथ होंगे। साथ ही साथ उन्होंने किसानों के लिए सरकार द्वारा लिए जा रहे कई खतरनाक निर्णय जैसे घर में यदि दो चौपाये पशु होंगे तो चाहे वह भैंस हो या बकरी हो आपको कमर्शियल कनेक्शन लेना होगा,पराली जलाने पर एक करोड़ का जुर्माना होगा ।इस प्रकार की अदूरदर्शिता पूर्ण दिए जाने वाले सरकारी नियम की धज्जियां उड़ा दी है ।किसान यूनियन की दूरदर्शिता और प्लानिंग को देखते हुए सरकार के हाथ पांव फूंलने स्वाभाविक है क्योंकि जो प्लैनिंग कमिटी सरकार के पास है जो सूट बूट टाई में और ए सी के अंदर बैठकर निर्णय नियम बनाती हैं ,उनसे कहीं ज्यादा दूर की सोच रखने वाले यह किसान बंधु सरकार को इस तरीके से निराश कर रहे हैं कि तुम अगर 1 किलोमीटर दूर की सोचते हो तो हम 1000 किलोमीटर दूर आगे की सोचते हैं। जैसे कि उनका हालिया दिया गया बयान कि वह अभी से गर्मी की तैयारी हेतु  किसान यूनियन द्वारा धरना स्थल पर टेंट के अंदर गर्मी से बचने के लिए कूलर का आर्डर दे दिया गया है और यदि उपयोग में नहीं आया तो वही कूलर आधे दाम में वापस भेज देने तक की सोच रखी गई है । सरकार को इसमें चेत जाना चाहिए 26 जनवरी के लिए अभी चंद दिन ही बाकी हैं परंतु यह बावले अनशनकारी किसान तो इतनी दूर की सोच रहे हैं ।अर्थात इन से पार पाना अब सरकार को मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है ।यह पानी की धार के समान अपने आंदोलन को सहज गति से बढ़ाते हुए इतनी दूर तक ले जाएंगे ।पानी कि धारा के बारे में सभी जानते हैं धीरे-धीरे ही सही पर बड़े-बड़े पत्थरों को भी काट देती है ।इसलिए अपनी हठधर्मिता को दूर करते हुए और अपनी बनी बनाई इमेज को कायम रखने के लिए मोदी सरकार को अब इनका रुख मोड़ने के बजाय सरकार को अपनी धारा को मोड़ लेने में ही भलाई समझ में आनी चाहिए ।अन्यथा जो जितनी तेजी से ऊंचाई को ग्रहण करता है वह उतनी तेजी से नीचे आता है विज्ञान के सिद्धांत अब बहुत जल्द ही चरितार्थ होने जा रहा है ।जिस मोदी की लोग वाहवाही करते थे और जिस के संबंध में लोग कुछ भी अनर्गल बातें सुनने पर सोशल मीडिया और समाज में भीड़ में जो लोगों पर टूट पड़ते थे, आज उनके किसी प्रवक्ता या किसी कार्यकर्ता की हिम्मत नहीं हो रही है कि वह मोदी के विरुद्ध गरियाने वालों को , विरुद्ध किसी प्रकार का कथन करने वालों का प्रतिकार कर सकें। इसी से समझ जाना चाहिए कि भारतीय जनता पार्टी के लिए यह कितना दुखद और भयावह भविष्य है। कितनी मुश्किल से राष्ट्रवादी पार्टी के रूप में उभरकर के ऊपर आई थी उतनी तेजी से रसातल की ओर बढ़ रही है।

उम्मीद करते हैं कि जल्द से जल्द इस काले कानून को सरकार समाप्त करें ।निजी करण की अपनी सभी नीतियों को त्याग करें ।बेरोजगारी जो चरम सीमा पर बढ़ रही है उसमें रोजगार तो पैदा कर नहीं पा रही है परंतु उसकी आड़ में निजीकरण करने के लिए जिस तरीके से शासकीय संस्थान, रेलवे ,बिजली ,एयरपोर्ट ,हॉस्पिटल, स्कूल इत्यादि को यह बढ़ावा दे रही है ।यह बहुत अच्छे शुभ संकेत नहीं है कि आप के बनाए हुए नियम और कानून सबको रास आयेंगे ।प्रजातंत्र में विपक्ष और हर प्रकार के कानून का काला पक्ष देखकर चिल्लाने वालों की कमी नहीं है। सरकार अपने साथ में सुप्रीम कोर्ट को भी ले डूब रही है और जिस मंदिर पर इस देश को आस्था है ।अब वह भी दागदार होता जा रहा है क्योंकि इस धर्म युद्ध में जो भी जिसके पक्ष में बोलेगा उसके पास यदि पर्याप्त आस्था, प्रमाण और जानकारी नहीं होगी उनको नहीं बोलना चाहिए ।अन्यथा वह मुंह की ही खाएगा क्योंकि धर्म क्षेत्र में केवल एक की विजय होती है "न्याय और अन्याय की ",और फैसला सरकार को लेना है कि इस कुरुक्षेत्र में चल रहे युद्ध को कब तक विराम दे सके और देश की अन्य  बची अति आवश्यक समस्याओं पर विचार कर सकें।

देश और घर चलाना इतना आसान नहीं है।
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1. क्या वास्तव में किसानों की मुख्य समस्या एमएसपी ही है ?

सरकार चाहती है कि किसान अपनी फसल ओपन मार्केट में प्रतिस्पर्धी दर्शक भेजें जिससे उन्हें अच्छी राजस्व की प्राप्ति हो सके परंतु बिना बिचौलिये के क्या यह संभव है?
क्या यही कारण है कि कांग्रेसी तुष्टीकरण की राजनीति विगत 70 सालों में करती आ रही थी की एक को मनाए तो दूजा रूठ जाता है ।किसानों की स्थिति पर विचार नहीं कर सकी।
क्या सरकार को प्रतिवर्ष एमएसपी का निर्धारण अपने बफर स्टॉक को देखते हुए करना चाहिए ताकि किसान उन्हीं फसलों को ज्यादा पैदावार करें जिनकी देश में आवश्यकता है?


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