अभी मेरी उम्र ही क्या है भाग 1 उपन्यास

रोमांस में समय काफी चाहिए ऐसा मानना है आजकल के युवा पीढ़ी का। शादी के बाद तो केवल बाल बच्चे और गृहस्ती के चूल्हा चक्की में व्यस्त रह जाते है लोग उससे बचने के लिए केवल मिलना जुलना और मौज मस्ती धींगा मस्ती में अपने यौवन को गुजारना चाहते हैं ऐसे ही 2 युवाओं की धड़कन की कहानी कबीर और समीरा की रवानी जो हर पल को उतार-चढ़ाव में जीना चाहते हैं। पर समाज की रीति रिवाजों के बंधन को जानते समझते हुऐ किस अधिकतम सीमा को पार कर जाते हैं पढ़िए इस उपन्यास में

t4unew : अभी मेरी उम्र ही क्या है भाग 1 उपन्यास

कबीर अपने वर्ग के अपने उम्र के विपरीत लिंगी मनुष्य प्राणी से कुछ दूरियां बना कर रखना चाहता था क्योंकि पैदाइशी उसे इस बात का एहसास था कि उसमें और उसकी शख्सियत में  कुछ खास है जो उसकी जाति के उसके लिंग के लोगों में नहीं है। उसकी किसी भी आगंतुक के मुलाकात से पहले वह झिझकता जरूर था पर अच्छा खासा बांका जवान लगता था....

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उसके लंबे बाल छोटी छोटी आंखें और गोरा सा अंडाकार चेहरा जो अपने बालों को झटक कर आंखों में आने से रोकता था ।ऐसे नौजवान से  मुलाकात अनायास जब भी होती थी वह बस स्टैंड पर खड़े बस नंबर 44 के आने का इंतजार कर रहा  होता था ।

सिटी बस के आते ही धक्का-मुक्की तेज हो गई थी ।अपनी सीट पाने के लिए लाइन में लगे लोग सिटी बस के हैंडल से लगी और कंडक्टर से पीछे वाली सीट को पाने के लिए बेताब थे ।क्योंकि दिन भर की थकान के बाद जब लोग इस कदर परेशान हो जाते हैं की होने वाली 15 से 20 किलोमीटर की यात्रा भी जरा खुशबूदार गुजरे तो ऐसी सीट का चुनाव करते यात्री  जहां कोई आगे अच्छी सी सूरत और खुशबू बिखेरते हुई मदमस्त करने वाले छवि हो। वही अपनी सीट तत्काल कबजाने को आतुर रहते हैं।

अक्सर अप डाउन करने का समय हेडफोन लगाकर अच्छे ड्रेस और रूवाब में दिखते है जवां लड़के लड़कियां।किसी को  भी आप देखिए उसके गाने गुनगुनाते सुनने में लगता था जैसे कि पूरा अमरकंटक और अरावली श्रेणियों की पर्वतों की बहार उसके जुबां पर आ गई हो । अपनी बंद और छोटी बड़ी आंखें  से  खोजती रहती थी एक ऐसी हसीन जीवन को जो उसके जीवन में उसके बजट के अनुसार जीवन को खुशबूदार बना दे। आज की भागदौड़ और कंपटीशन भरे युग में ऐसी नौकरियां करने वाले  हजरत और ऐसी कुंवारी छोकरियां मिलती कहां है जनाब!

क्या यह सीट आपकी है एक खनकती हुई आवाज से कबीर का ध्यान टूटा ।

उसने कहा हां मेरी तो नहीं लेकिन आप चाहे तो बैठ सकती हैं। क्योंकि मैं इस पर बैठने वाला था ।उसने कहा जी आप ही बैठ जाइए ।

कबीर ने कहा नहीं लेडीस फर्स्ट दोनों मुस्कुरा उठे ।

दरअसल कबीर उस बाला के वस्त्रों से उठने वाली भीनी भीनी खुशबू का आनंद लेने के लिए अपनी सीट कुर्बान करने को तैयार था ।

आप कहां तक जाएंगे? उस बाला ने कबीर से पूछा

कबीर ने कहा बहुत ज्यादा दूर ....।

क्या मतलब ...बहुत ज्यादा दूर से क्या मतलब है आपका ?

जी आप जहां जाएंगे उससे मैं बहुत ज्यादा दूर जाऊंगा। कबीर ने मुस्कुराते हुए कहा ।मैं कहां जाती हूं कि आपको कैसे मालूम आप तो ऐसा कह रहे हैं जैसे आप जानते हैं कि मैं कहां रहती हूं ।

कबीर ने मुस्कुराते हुए कहा जी अंदेशा तो मैं लगा सकता हूं कि आप मुहाल नंबर 3 के आसपास कहीं रहती हैं। मैंने अक्सर आपको वहां पर उतरते देखा है।

जी नहीं आप तो जासूसी करवा रहे हैं। मैं ऐसे किसी जगह नहीं जानती और हां मुझे लगता है कि आप मेरी जासूसी काफी दिनों से कर रहे हैं ।इस बार कबीर सहम गया। क्योंकि आरोप सीधा था जासूसी का मामला था । किसी की निजता का हनन था।किसी जवान लड़की की पीछा करना या जासूसी करना अच्छी बात नहीं होती यह बात सबको मालूम है कि अगर किसी की चोरी रंगे हाथों पकड़ी गई तो उसके बाद अंजाम क्या हो सकता है। कबीर ने हक लाते हुए कहा नहीं ऐसा तो नहीं है ...मुझे अक्सर आपके जैसे एक खूबसूरत सी लड़की जो करोना का नकाब लगाए हुए मास्क लगाए हुए अक्सर सिटी बस के इंतजार में या उतरते हुए मुझे वहां दिखती है इसलिए मुझे लगा शायद वह आप ही होगी।

इस बार वह बाला खिलखिला कर हंस पड़ी और कहने लगी शायद यह भी एक अच्छा तुक्का है । अपने इस दलील क्यों कामयाब होते देख कबीर थूक का घूट गुटकते हुए बात कुछ आगे बढ़ाया और पूछा हाय माय नेम इज कबीर एंड यू?

माय सेल्फ समीरा

और आप कहां रहते हैं अगर मैं गलत नहीं हूं तो आप भी अप डाउन करते हैं ।

जी मैं मुहाल नंबर 2 में रहता हूं और आजकल यहां स्टोर इंचार्ज के रूप में बजाज बुक डिपो के पास हेलीकन कंपनी में काम करता हूं ।

क्या काम करते हैं आप.. बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ता गया। इसी बीच टिकट टिकट टिकट की आवाज आई।

मुहाल नंबर 4 एक टिकट प्लीज.. समीरा ने कहा हां ।

और आपको कहां जाना है भाई साहब ?

मुझे मुहाल नंबर दो का टिकट दे दीजिए।

वैसे मैं रोजाना बस पास रखता हूं परंतु आज मेरे पास की एक्सपायरी हो चुकी है। किसी हसीन लड़की के सामने अपनी ईमानदारी की शख्सियत को मजबूत करने के लिए कबीर ने पहले ही टिकट कंडक्टर को यह बता दिया कि वह एक्सपायर होने वाले पास टाइम के बाद इमानदारी से टिकट लेना ज्यादा अच्छा होता है। कोई बात नहीं भाई साहब निकालिए ₹20 निकालिए कंडक्टर ने कहा ।

 हां भाई आगे वाले बताएं कहां जाना है कहां जाना है? कंडक्टर अपना काम करते हुए बस के अगले छोर तक बढ़ जाता है और कंडक्टर के उठने से  समीरा की बाजू की सीट खाली हो जाती है। अंधे को क्या मिले दो आंख ,जब एक ही मिल जाए तो वो भी काफी थी ।कबीर को आराम के साथ साथ अब इत्मीनान भी मिल गया कि सफर छोटा ही सही पर अब लंबा चलने लायक कुछ ऐसा मुकाम मिलने वाला है जो इसको अप डाउन की यात्रा जीवन भर चलती है ,उससे शायद कुछ ऑक्सीजन मिल जाए। सबसे पहले लपक कर  कबीर समीरा की बाजू की सीट में बैठ जाता है और अपने लंबे लंबे बालों को कानों के पीछे की तरफ से से हंसते हुए छोटी सी कहकहे वाले मुस्कान लगाते हुए कहता है ...आज गर्मी कुछ ज्यादा है ना मगर फिर भी मौसम के हिसाब से कुछ ठंडक छा रही है।

समीरा उनकी बात का मतलब समझ चुकी थी की इस भरे जून के माह में जहां चिपचिपाती हुईं गर्मी के बीच ठंडक जैसी बात कहां से आ गई की आशिकाना मिजाज के होते हैं अधिकांश लड़के जवान आशिक होते है। मन ही मन में यह बात समीरा  सोच रही थी।

सारे लड़के एक से होते हैं जहां लड़की देखी गर्मी ठंडी मौसम और घर बाहर के बारे में बात करने लग जाते हैं क्योंकि इन मर्दों की तासीर एक जैसी होती है कि जहां फूल देखे भवरे जैसे लाइन मारने लगे। फिर भी समय तो काटना था क्योंकि अब वह हम सीट हो चुका था और दोनों की बाजूए आपस में टकराने लगे थे। कबीर अपने  गठे रोविले शरीर से समीरा को किसी तरीके से आहत न पहुंचाते हुए एक और सरक कर बैठना मंजूर कर रहा था पर यह भी चाह रहा था कि संपर्क टूटे ना क्योंकि दो जवां दिलों के बीच यही तो एक मौका मिलता है जहां मजबूरी में ही सही पर दूरियां कम होती हैं। वैसे भी चलती बस में किसी का बस नहीं चलता।

Excuseme क्या आप थोड़ा सरकर बैठेंगे समीरा ने कहा।

आ हां हां क्यों नहीं अगर आपको तकलीफ हुई तो मैं खड़ा हो जाऊं कबीर ने कहा।

मुझे अपने मोबाइल और अपने बैग से निकालना है। समीरा ने बताया।

मोबाइल की बजी घंटी से समीरा  का ध्यान टूटता है

नहीं ऐसी बात नहीं मुझे अपने पर्स से  अपना पेन फोन और जानकारी निकालना है समीरा ने कहा।..... वैसे भी अगर आपके पास पैन ना हो तो चाहूं  की बंदा आपकी मदद कर सकता है । कबीर ने कहा ।

समीरा ने मुस्कुरा कर कहा नो थैंक्स मैं अजनबीयो से मदद नहीं लेती।

कबीर बातों को आगे बढ़ाने के लिए समीरा से पूछता है कि क्या उसे इस प्रकार की फिल्मी जिंदगी  जैसे डायलॉगअच्छी लगती है?  फिल्म में लोग अजनबी से बात करते-करते अच्छे दोस्त बन जाते हैं। समीरा ने कहा यह फिल्म और विदेशी लोगों की जैसी बातें अब भारत में सामान्य और पुरानी हो गई है और लोग बात करते-करते अच्छे दोस्त और अच्छे हमसफर बन जाते हैं ।

पर अभी मेरा इस बात पर कोई इंटरेस्ट नहीं है समीरा बोली ।

इधर उधर की बातें होते होते हैं 2 स्टाफ पहले ही कबीर के मन में यह बात उठती है कि इतने प्रैक्टिकल सोच रखने वाली है  यह लड़की है कौन जो यह जानती है कि इस फिल्मी दुनिया में 4 दिन की चांदनी फिर अंधेरी रात होती है ।जैसे की फिल्म हीरो हीरोइन अटक मटक सटक कर कैमरे की रील तो जरूर बना देते हैं परंतु रियल लाइफ में सब जानते हैं कि दाल और सब्जी का भाव क्या होता है ?

सब्जी से बात अच्छी याद आई कि आज घर में शाम के लिए सब्जी नहीं है अपने ऑफिस और काम से लौटते समय मैं उपयोग में आने वाली 2 दिन की सब्जियां तो खरीद ही सकता था ताकि मेरे घर में को  कोहराम मचा रहता  है की घर को चलाने वाली कोई जिम्मेदार मैनेजर लड़की बहू यदि आ जाए तो जीवन में एक नियमितता से बन जाए मां की आशा को पूरा करने में कबीर अभी बहुत ज्यादा इच्छुक नहीं है।

अपने उन्नत वक्ष स्थल और सुडोल चेहरे के खूबसूरती लिए समीरा का यौवन और बात करने का सलीका हर विपरीत लिंगी जीव जैसे महान मनुष्य और विपरीत योनि के जियो को सहज आकर्षित कर सकता था। मगर जैसी उसने समाज और वातावरण में देखा था वैसा कबीर का उत्साह उसे समझ में नहीं आया क्योंकि कुछ देर इंटरेस्ट की बातें करने के बाद कबीर गंभीर हो गया था शायद मोहाल नंबर चार आने वाला था समीरा ने अपनी तिरछी नजर से कबीर को देखा और बस से उतरने लगी समीर ने भी ऐसे कोई गंभीर नजरों से समीरा को नहीं देखा।

कबीर बस से उतरने के बाद सीधे पान के तिगड्डे पर चला गया और बैठकर इतनी रामसेतु 3 सिगरेट के कश लगाने के लिए लाइटर सूलगाया........

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