आज भी प्रासंगिक है ... महावीर की वाणी    सुबोध मलैया, सागर (मध्यप्रदेश)

महावीर-जीवन-वृत्त का मूल आधार-स्तम्भ जैन आगम है. उपलब्ध समस्त जैन साहित्य के उद्गम का मूल भगवान् की वह दिव्य वाणी है, जो बारह वर्ष की कठोर साधना के पश्चात् केवल ज्ञान की प्राप्ति होने पर लगभग 42 वर्ष की अवस्था में   (ई. पू. 557 वर्ष) श्रावण कृष्ण प्रतिवदा के दिन ब्रह्म मुहुर्त में राजगृही के बाहर स्थित विपुलाचल पर्वत पर प्रथम बार निःसृत हुई और तीस वर्ष तक निःसृत होती रही थी.

 आज भी प्रासंगिक है ... महावीर की वाणी    सुबोध मलैया, सागर (मध्यप्रदेश)

t4unews:-भगवान् महावीर आज भी ऐतिहासिक चरित्र के रूप में सर्वमान्य हैं. एक कालजयी व्यक्तित्व भगवान महावीर जिनके सिद्धांत व साधना किसी भी काल के थपेड़े में निष्प्रभावी नहीं होते वह सदाकाल शाश्वत एक जैसे रहते हैं. उनके चरित्र पर युग-युगान्तर में अलौकिकता, पौराणिकता, ईश्वरीय भगवन्ता, दिव्यता के आवरण युगीन संदर्भ में डाले गए हैं. महावीर यथार्थवादी थे- उत्कृष्ट यथार्थवादी उनकी यथार्थवादी प्रतिभा पौराणिक युग में चमत्कारों, अतिशयों और देवीय घटनाओं से लद गयी. मध्य युग में तपस्या छवि उपस्थापित हुई लोक-मानस ने उन्हें अतिवादी माना. आधुनिक युग में उनके प्रमाणिक एवं विश्वसनीय मानवीय रूप को अंकित कराने का प्रयास रहा है. महावीर ने अनेकांत के द्वारा जैन धर्म को युगानुकूल रूप दिया. 24 वें तीर्थंकर भगवान् महावीर और प्रथम तीर्थंकर भगवान् ऋषभदेव के बीच का समय असंख्यात वर्षों का है भगवान् महावीर जैन धर्म के तीर्थ प्रवर्तक कहे गये हैं अतः यह सर्व विदित है कि जैन तीर्थंकरों की परम्परा अति प्राचीन है. प्राचीन शिलालेख, भगवान् महावीर की प्राचीनतम मूर्तियां, बौद्ध त्रिपिटक ग्रन्थ, जैन साहित्य-आगम- प्राकृत्त-संस्कृत-अपभ्रंश-प्राचीन हिन्दी साहित्य में भगवान् महावीर ऐेसे व्यक्तित्व हैं जिनकी ऐतिहासिकता निर्विवाद रूप से स्वीकार की गई है.

महावीर-जीवन-वृत्त का मूल आधार-स्तम्भ जैन आगम है. उपलब्ध समस्त जैन साहित्य के उद्गम का मूल भगवान् की वह दिव्य वाणी है, जो बारह वर्ष की कठोर साधना के पश्चात् केवल ज्ञान की प्राप्ति होने पर लगभग 42 वर्ष की अवस्था में   (ई. पू. 557 वर्ष) श्रावण कृष्ण प्रतिवदा के दिन ब्रह्म मुहुर्त में राजगृही के बाहर स्थित विपुलाचल पर्वत पर प्रथम बार निःसृत हुई और तीस वर्ष तक निःसृत होती रही थी.
भगवान् महावीर जैन धर्म के संस्थापक नहीं, मात्र धर्म सुधारक हैं. उन्होंने नैतिक नियमों को नये सिरे से, नई दिशा में व्याख्या की. भगवान् महावीर ने आमजन को जो स्वतंत्रता जो गौरव और गरिमा दी वह अनूठी और अद्वितीय है विश्व इतिहास में ऐसा सम्मान किसी महापुरुष को नहीं दिया गया. साधारणतया मनुष्य में भी उतनी ही क्षमता है परमात्मा होने की जो उनमें थी. सुख-दुख, पाप-पुण्य, शुभ-अशुभ, सफलता-विफलता अपने कर्मों पर आधारित है, अपने कर्मों के ही हम ही कत्र्ता हैं और उनका फल पाते हैं.
महावीर का मार्ग समर्पण, भक्ति का नहीं, ज्ञान का, श्रम का है यह जैनों की श्रमण परम्परा का परिष्कृत स्वरूप है. क्षत्रियों द्वारा प्रतिपादित श्रमण परम्परा, ब्राह्मण परम्परा के विरोध में महावीर के पहले से प्रचलित थी, भगवान् महावीर ने उसकी विसंगतियों और शिथिलताओं को परिष्कृत कर उसे पूर्ण वैज्ञानिक आधार दिया. भक्ति, चमत्कार, कृपा, आशीर्वाद आदि को नकारा, उनका मार्ग शाश्वत है और उसकी सार्थकता आज भी है और हमेशा रहेगी. महावीर, विचारक, दार्शनिक, नीतिज्ञ, त्यागी, तात्विक या उपदेशक न होकर एक क्रान्तिकारी साधक हैं.
भगवान् महावीर ने धर्म, जाति, लिंग भेद आदि को नकारा, उनके अनन्यतम ब्राह्मण शिष्य (गणधर) इन्द्रभूति गौतम के दीक्षित होने पर पहला आहार भगवान् महावीर ने एक ब्राह्मण के घर लिया, चन्दनबाला (दासी) के हाथों से आहार ग्रहण किया. हर जाति, धर्म और सम्प्रदाय के अनुयायी उनके शिष्य बने, स्त्रियों को उन्होंने पुरूषों के बराबर स्थान दिया उन्हें संघ में शामिल कर दीक्षित किया. धर्म को वैयक्तिक माना, सामाजिक और साम्प्रदायिक नहीं, उनके मतभेद वैचारिक और सैद्धांतिक थे, साम्प्रदायिक या जातीय स्तर पर नहीं.
तीर्थंकर भगवान् महावीर का सम्पूर्ण भारत में लगभग तीस वर्ष तक धर्मोपदेश व विहार होता रहा, उनके विहार की अधिकता के कारण भारत का एक बहुत बड़ा भू-भाग ही ‘बिहार’ के नाम से जाना जाने लगा बिहार प्रान्त के कई बड़े बड़े नगर “वर्द्धमान,“ “वीरभूमि“ उनके नाम पर बसे, उनके चिन्ह के नाम पर “सिंह भूमि“ नगर बसा है.
भगवान् महावीर ने सती प्रथा और पशु बलि की निर्दयता और हिंसा का तांडव देखा तब उन्होंने अपने प्रभावपूर्ण उपदेशों से जगह-जगह होने वाली सती प्रथा तथा पशुबलि जैसे क्रूर कर्म काण्डों को बंद कराया. भगवान् महावीर ने अपने उपदेशों में प्राणीमात्र की आत्मा की शुद्धता, आचरण की पवित्रता पर सबसे अधिक बल दिया. बौद्धिक सहिष्णुता अर्थात् दूसरों के दृष्टिकोण को समझना, उनके जीवन-दर्शन का महत्वपूर्ण अंग रहा है. महावीर के महान सिद्धांतों का प्रभाव जैनेतर भारतीय धर्मों पर भी परिलक्षित होता है. उनके सिद्धांतों में निहित सार्वजनित एवं कल्याणकारी भावनाओं के कारण ही ईसा की दूसरी शताब्दी में आचार्य समन्तभद्र ने उनके इस तीर्थ को सर्वोदय नाम दिया.
समय के उलटफेर और राजनीतिक उथल-पुथल के कारण वैशाली खण्डहरों में बदल गयी लोगों ने तो उसे भुला भी दिया किन्तु जैन धर्मावलंबियों के लिए यह गौरव की बात है कि वैशाली में यहाँ के जैन अवशेषों में एक उर्वर भू-खण्ड अभी भी शेष है जो यहाँ के नाथ क्षत्रिय परिवार के आधिपत्य में है. जहाँं तक इस परिवार के लोगांे की स्मृति जाती है इस भू-खण्ड पर कभी भी खेती नहीं की गयी क्योंकि उनकी प्रत्येक पीढ़ी यह विश्वास करती आ रही है कि भगवान् महावीर का जन्म इसी स्थान पर हुआ, इसलिए यह पूजनीय स्थान है. भारत के धार्मिक इतिहास में यह विशिष्ट घटना है कि इस परिवार के लोग 2500 सौ वर्ष के लंबे अन्तराल के बाद भी इस स्थान की गरिमा और महावीर की स्मृति को अक्षुण्ण बनाए हुए हैं. यहाँ के लोगों में भगवान् महावीर के प्रति आस्था और विश्वास उनकी लोक चेतना, उनके लोक-गीतों में बसी है. भगवान् महावीर को विवाह का निमंत्रण भेजने, वर को आशीर्वाद हेतु अहल्य भूमि ले जाने और भगवान् महावीर के निर्वाण दिवस पर दीपक जलाने की पुरातन परम्परा आज भी कायम है “बाबा महावीर“ के जयकारों और लोक गीतों की गूंज से गुंजायमान होता है पूरा क्षेत्र.
जैन धर्म का विपुल साहित्य और ग्रन्थ उपलब्ध है. मुगल शासन काल में बहुत ही विपरीत परिस्थितियों में हमारे आस्थाओं पर कुठाराघात करते हुए उनके अवशेषों को बचाते हुए सन्त, महात्माओं ने आत्म साधना द्वारा जिस सत्य का संदेश जैन धर्मावलंबियों को दिया उसकी आज भी उतनी ही आवश्यकता है जितनी पहले कभी थी. जैन धर्म किसी एक सम्प्रदाय का धर्म नहीं है, जैन धर्म को जो अंगीकार करता है वही जैन है. अहिंसा के मूल मंत्र को जैन धर्मावलंबी अपने सांस्कृतिक मूल्यों द्वारा आज भी कायम किए हुए हैं और यही उनकी अमूल्य धरोहर है. जैन दर्शन में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं है फिर चाहे वह वैचारिकी हो अथवा क्रियात्मक यही अहिंसा का सिद्धांत है, सहिष्णुता जैन विचाराधारा का एक विशिष्ट गुण माना जाता है. हिन्दु संस्कृति में अहिंसा और सहिष्णुता का सिद्धांत जैनों की ही महान देन है. इस अमूल्य विरासत के संरक्षण के प्रति हमारी बढ़ती उदासीनता और उपेक्षा चिन्ता का विषय है ऐसे माहौल में आज महावीर का धर्म सिर्फ चर्चाओं में रह जावेगा जबकि महावीर का जैन धर्म चर्चा का नहीं, धर्म का विषय है. महावीर ने अपने जीवन को ऐसे जिया कि स्वयं को जीतकर महावीर हो गए यदि हमें भी कुछ बनना है तो जीने का अंदाज बदलना होगा और वह भी कल नहीं आज बदलना होगा. महावीर को जानने की कम, जीने की ज्यादा आवश्यकता है, महावीर को जीने वाला ही महावीर का सच्चा अनुयायी होता है. महावीर को जीने का अर्थ है “महावीर की मानना“ और महावीर को जानने का अर्थ है “महावीर को मानना“. जैन धर्म कोई पारम्परिक विचारों, ऐहिक व पारलौकिक मान्यताओं पर अन्ध श्रद्धा रखकर चलने वाला सम्प्रदाय नहीं वह मूलतः विशुद्ध वैज्ञानिक धर्म है, भगवान् महावीर के मार्ग पर चलने की, उन्हीं की तरह मुक्त होने की कोशिश निरन्तर की जानी चाहिए.
यह समाज की गौरव की बात है कि भारतीय संविधान की मूल प्रति पर भगवान् महावीर स्वामी की दिगम्बर मुद्रिका और उनके संदेश अंकित हैं जिसके लिए भारतीय संविधान निर्मात्री सभा के सदस्य श्री रतनलाल किशोरीलाल मालवीय   (सागर जैन समाज के प्रतिष्ठित घराना मलैया परिवार के सम्मानीय सदस्य) का सराहनीय प्रयास रहा. समग्र जैन समाज उनके इस कृत्य से गौरवान्वित है.

लेखक जैन समाज के संभ्रांत विचार वादी और महावीर स्वामी के जीवन के लिए समर्पित हैं।

सुबोध मलैया
“आदिनाथ“ वैशाली नगर
सागर - 470001 (मध्यप्रदेश)
मोबा.  9893620732



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